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Monday, 17 March 2014

रोंपा एक नया अफसाना







ज्यों हीं जड़ से उखड़ा पुराना

रोंपा एक नया अफसाना
क़ब्र वही थी
अब्र नया था
लहराता अलमस्त वहाँ
महक रहा था
लहक रहा था
नया नया
दफ़न हुआ था जो पुराना
कभी तो था वो नया नया
बुझ ही गया
रुझ ही गया
आखिर था वो बहुत पुराना
बहुत पुराना बहुत सयाना
नया रहेगा नया  नया क्या
नया होगा और नया  क्या
जैसे और पुराना  हुआ पुराना
बहुत पुराना बहुत सयाना

08 -12 -2013


5 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बुधवार (19-03-2014) को समाचार आरोग्य, करे यह चर्चा रविकर : चर्चा मंच 1556 पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. आपको यह बताते हुए हर्ष हो रहा है के आपकी यह विशेष रचना को आदर प्रदान करने हेतु हमने इसे आज के ब्लॉग बुलेटिन - आराधना पर स्थान दिया है | बहुत बहुत बधाई |

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  3. सुंदर प्रस्‍तुति‍

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  4. सुंदर अभिव्यक्ति के साथ बेहतरीन रचना

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  5. Hello mam......... aapki kavita me aapke vicharo ki ati sunder abhivyakti hai....... i m searching for yr poem 'ek this son chiraiya'....pls do forward its link.

    With kind regards
    Jyoti

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