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Thursday, 24 January 2013

मैं कह नहीं पायी





कभी मैं कह नहीं पायी 
कभी मुझे कहने नहीं दिया 
क्या कहती 
यही न कि 
थोडा जीने दो 
जब भी बाहर झांकना चाहा 
आँखों पर हाथ रख दिया 
क्या देखती मैं 
जो देखा था .. उसके बाद 
पाँव बाहर रखना चाहा 
दरवाजे पर सांकल थी 
कहाँ जाती मैं 
खुद को रौंदती वापिस आई 
हर बार 
पहुंची कहीं नहीं 
न जी सकी 
न मर सकी 
देखती हूँ फटी फटी आँखों से 
दुनिया 
जो आधी भी मेरी नहीं है

9 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (26-1-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

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    1. आभार दोस्त 'चर्चा मंच' में शामिल करने के लिए ..
      सुखद अनुभूति है ..

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  2. सुन्दर रचना!
    गणतन्त्रदिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!

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    Replies
    1. आभार डॉ शास्त्री ..
      आपको भी गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं

      सादर ..

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  3. बेहद मार्मिक अभिव्यक्ति..

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  4. बहुत सुन्दर मर्मस्पर्शी रचना ..
    गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं.

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    1. स्वागत और आभार कविता जी ..
      आपको भी गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं

      सादर ..

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  5. बस दुनिया है !!!!
    और मै ??? शायद हूँ ...शायद नहीं !!!
    झंकझोरती भावनाएँ उमड़ पड़ी हैं,रचना का रूप धरकर !!!

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