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Saturday, 9 February 2013

कविता नहीं लिखती थी


बकवास करती थी बहुत
देखा था
हंसती भी बहुत थी
सोशल थी ,वर्कर थी ,
पॉपुलर थी ,सेंसिटिव थी

कुछ गलत फहमियाँ भी थी उसे
( हो जाती हैं )
इश्क -मुहब्बत में पड़ी नहीं थी
(घनी ज़ालिम थी )
अच्छाइयां भी थी उसमे
(कविता नहीं लिखती थी )
मर्दों को लम्पट नहीं समझती थी
(पाला जो नहीं पडा था )
गाली-गलौज कर लेती थी
( मौके और दस्तूर के हिसाब से )
 हाथापाई भी कर लेती थी
( मन करता तो )
चीखने -चिल्लाने से परहेज़ नहीं करती थी
( यूँ  बहुत शर्मीली थी )

ये थी -थी क्या लगा रखा है
मरी नहीं है अभी
मरने की प्रक्रिया में हैं ...

Thursday, 24 January 2013

मैं कह नहीं पायी





कभी मैं कह नहीं पायी 
कभी मुझे कहने नहीं दिया 
क्या कहती 
यही न कि 
थोडा जीने दो 
जब भी बाहर झांकना चाहा 
आँखों पर हाथ रख दिया 
क्या देखती मैं 
जो देखा था .. उसके बाद 
पाँव बाहर रखना चाहा 
दरवाजे पर सांकल थी 
कहाँ जाती मैं 
खुद को रौंदती वापिस आई 
हर बार 
पहुंची कहीं नहीं 
न जी सकी 
न मर सकी 
देखती हूँ फटी फटी आँखों से 
दुनिया 
जो आधी भी मेरी नहीं है

Saturday, 29 December 2012

हिम्मत











हर बार बगावत करनी चाही थी 
मोर्चा संभालने की हिम्मत थी 
आसमान छूते हौसले थे 
अकेले चलने की हिम्मत थी 
कदम आगे बढ़ रहे थे 
नज़र जो पड़ी जिस्म को भेदती 
नीचे से ऊपर 
ऊपर से नीचे 
डर गई 
हर बार 
मर गई 
हर बार 

Thursday, 22 November 2012

कहना है बहुत






कहना है बहुत
कहा कुछ नहीं
फिर भी
कहते रहो तुम
सिर्फ सुनूँ मैं

दुनिया है हसीं
वक़्त है नहीं
तो जाओ
उधर देखो तुम
तुम्हे देखूं मैं

बरसे बदलियाँ
नयन न कभी
बरसाएं जल
हरे रहो तुम
सूख जाऊं मैं

मंजिल हो गगन
क़दमों में ज़मीन
हौसला लिए
आगे बढ़ो तुम
पीछे रहूँ मैं

वादों को कहो
ज़हन में कभी
कुलबुलाएं न
भूल जाना तुम
याद रखूँ मैं

(Picture courtesy Google)

Tuesday, 6 November 2012

कुछ टूटा है






कहीं कुछ टूटा है
दर्द नहीं हुआ
आंसू नहीं गिरे
जैसे प्यार का दरिया
कुछ और सिमट गया
कहीं कोई सहम गया है
तूफ़ान नहीं आया
तबाही नहीं हुई
जैसे आंसू का समंदर
उफान से पहले
ठहर गया 

Wednesday, 31 October 2012




अन्दर  दा  शोर  एहना  वध गिया है
बाहर दीयां वाजां सुणाई नईं   देंदीयाँ

ओह   कोल  वी  हैं  ते  हैं दूर वी  बहुत
उसदे  आन दीयां आहटां सुणाई नईं देंदीयाँ

मरण  नूं  जी  ते  नईं  करदा  हुन मिरा
मैंनू आप्नियां सावां सुणाई नईं  देंदीयाँ

ज़ख्म दे रई है ज़द्दो-ज़हद आपणे नाल
क्यूं किसे नूं कुरलाहटाँ सुणाई  नईं  देंदीयाँ

ओ  इश्क  है  मेरा, ओ ही  रब्ब  है  मेरा
क्यूं  मेरियाँ फ़रियादां सुणाई  नईं देंदीयाँ 

Wednesday, 10 October 2012

टापों की आवाज़




आती है टापों की आवाज़ 
गुज़रते हैं घोड़ों और ऊंटों के कछावे  जब 
आज भी ...
आज भी 
दिल से गुज़रते कई काफिले
पल भर को सहम जाते हैं
सिंध  के समंदर पर लहराते 
उधर से इधर को आते हुए 
चीर दिया गया था बीचों-बीच से
हस्ती को 
बहता लहू 
घिसट  रहा था 
उधर से इधर ..

दौड़ती रेलगाड़ियों में 
परिचित चेहरों को ढूंढते 
बदहवास कुछ क़दम 
जो नहीं पड़े थे कभी ज़मीन पर 
बेसुध नंगे सिर
पगड़ियों की शान भूल 
बोगी-दर-बोगी 
तलाशते  उस बच्चे को 
छूट गया था जो उधर 
दसवीं के इम्तहान  के लिए 
शको-शुबह के मारे 
कोसते उस लम्हे को 
जिसमें सौंप आये थे 
अपनी अमानत 
और लाये थे साथ अपने 
हिफाज़त का वादा 
उधर  से आती हर गाड़ी
लाती इधर 
एक उम्मीद 
क्या तलवार देख पाएगी 
उससे जुडी उम्मीदें 
या काट डालेगी हर सपना
उधर ..


घंटों ज़िन्दगी ने मौत को अपने जिस्म पर
सरसराते देखा था 
मुर्दा जिस्मों के बीच एक ज़िन्दगी 
सांस ले रही थी सहमी सहमी 
पांच ट्रक आज भी जिंदा हैं 
स्मृति में
जो चले थे जिंदगियों को लेकर उधर से ..
खून की चादर ओढ़े 
अकेले रेखा पार करते 
इधर को आते 
अपराध बोध से ग्रसित 
सवालिया आँखों से आँखे चुराते 
मुहाजिर ने रख दिया था क़दम
इधर ...

सिंध की छाती पर 
लहराई एक कश्ती 
इधर या उधर ..की खींच-तान  में झूलती 
अंततः धकेली गई   इधर 
हिफाज़त का वादा निभाया गया था 
ज़मीन के टुकड़े  हुए 
वादों  और भरोसे के नहीं
इधर  और उधर ..

इधर की ज़मीन पर 
वो जवां क़दम 
नहीं भूल पा रहे थे उधर की कशिश 
वो पत्थर उछालना 
खजूर का टप्प से गिरना
दरख़्त-दर-दरख़्त  फुदकते 
वो बटेर वो बुलबुल
वो रेल का पुल 
वो केम्पबेलपुर का स्कूल और
 प्रार्थना   ..
'लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी '
माँ का हाथ छुड़ा कर 
समंदर सी सिंध में छलांग लगा देना 
देर तक गहराई नापना 
वो बेडमिन्टन कोर्ट और 
फुटबाल का मैदान 
वो ओवरकोट वो कैप 
वो  कोर्डरॉय वो लैदर शूज़ 
उधर ..

मलमल का कुरता
पाँव नंगे ...
ज़िन्दगी फिर भी आगे बढ़ना चाहती थी 
'कुली .....' 
और उस ज़हीन ने उठा लिया 
दौड़ कर सारा सामान 
'शाह जी ' और 'लालाजी ' छूट गए थे उधर 
पल्लेदारी का एक आना 
कहीं ज्यादा कीमती था इधर 
केम्प-दर- केम्प ढूँढना था 
टूटी और छूटी कड़ियों को
इधर ..

जो छूटा  था उधर 
घर-आँगन ,ऊँट-घोड़े ,
शानो-शौक़त  नहीं था 
जो छूटी थी 
पहचान थी वो 
खुद से काट कर फेंक दिया गया था उन्हें  
बिना तलवारों -खंजर  के 
उधर भी ..
इधर भी ..

(08-10-2012)